इज़राइल और ईरान के बीच दुश्मनी का इतिहास: कैसे दोस्त दुश्मन बने

 इज़राइल और ईरान के बीच दुश्मनी का इतिहास: कैसे दोस्त दुश्मन बने


आज इज़राइल और ईरान मध्य पूर्व के दो सबसे बड़े दुश्मन माने जाते हैं, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। यह दुश्मनी 1979 की ईरानी क्रांति के बाद शुरू हुई, जब ईरान में शाह की सरकार गिर गई और अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में एक इस्लामिक गणराज्य की स्थापना हुई। इस लेख में हम समझेंगे कि कैसे ये दोनों देश कभी अच्छे सहयोगी थे और किन कारणों से आज एक-दूसरे के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं।

1979 से पहले: कैसे थे संबंध?

1948 में इज़राइल के गठन के बाद, अधिकांश अरब देशों ने उसे मान्यता देने से इनकार कर दिया और पहला अरब-इज़राइल युद्ध छिड़ गया। लेकिन ईरान ने इस युद्ध में भाग नहीं लिया । वास्तव में, ईरान इज़राइल को मान्यता देने वाला तुर्की के बाद दूसरा मुस्लिम-बहुल देश था 

Israel and Iran: The History of Hostility – How Allies Turned Into Rival

उस समय ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था, जो अमेरिका का करीबी सहयोगी था। इज़राइल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने अरब देशों के शत्रुतापूर्ण रवैये का सामना करने के लिए "परिधि सिद्धांत" विकसित किया, जिसके तहत इज़राइल ने गैर-अरब मुस्लिम देशों (तुर्की और ईरान) से गठबंधन करने की कोशिश की ।

1950-60 के दशक में दोनों देशों के बीच व्यापार, हथियारों की बिक्री, तेल आपूर्ति और खुफिया जानकारी साझा करने सहित कई क्षेत्रों में सहयोग था । 1957 में, ईरान ने अमेरिका के साथ एक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए और 1967 में अमेरिका ने ईरान को एक अनुसंधान रिएक्टर और समृद्ध यूरेनियम ईंधन प्रदान किया ।

1979 की इस्लामी क्रांति: ऐतिहासिक मोड़

1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति ने सब कुछ बदल दिया। शाह को उखाड़ फेंका गया और अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में एक धार्मिक राज्य स्थापित हुआ ।

नए शासन का इज़राइल के प्रति दृष्टिकोण बिल्कुल अलग था। खुमैनी ने इज़राइल को "छोटा शैतान" और अमेरिका को "बड़ा शैतान" कहा । ईरान ने फिलिस्तीन का समर्थन करना शुरू कर दिया और इज़राइल को "इस्लाम का दुश्मन" घोषित कर दिया । राजनयिक संबंध तुरंत काट दिए गए और ईरानियों को "अधिकृत फिलिस्तीन" की यात्रा से प्रतिबंधित कर दिया गया ।

दिलचस्प बात यह है कि 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान, इज़राइल ने गुप्त रूप से ईरान को हथियार बेचे और वित्तीय सहायता भी दी । लेकिन यह अंतिम सहयोग के क्षण थे, और उसके बाद दोनों देशों के बीच दूरियां लगातार बढ़ती गईं।

छाया युद्ध का दौर (1979-2023)

क्रांति के बाद के दशकों में, इज़राइल और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव नहीं हुए, बल्कि दोनों ने प्रॉक्सी और सीमित रणनीतिक हमलों के माध्यम से एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की । इस अवधि को "छाया युद्ध" कहा जाता है ।

ईरान का "प्रतिरोध का अक्ष"

1982 में, जब इज़राइल ने लेबनान पर आक्रमण किया, तो ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने वहां शिया मुसलमानों के साथ मिलकर हिज़बुल्लाह की स्थापना की । यह संगठन आज इज़राइल के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है। ईरान ने हिज़बुल्लाह को हथियार, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान की ।

इसके अलावा, ईरान ने "प्रतिरोध का अक्ष" नामक एक नेटवर्क स्थापित किया, जिसमें हमास (गाजा), हिज़बुल्लाह (लेबनान), हूती विद्रोही (यमन), और सीरिया तथा इराक में विभिन्न शिया मिलिशिया समूह शामिल हैं । ये सभी समूह इज़राइल और अमेरिका विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं।

इज़राइल की जवाबी कार्रवाइयां

इज़राइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाते हुए कई गुप्त अभियान चलाए:

· 2010 का स्टक्सनेट हमला: अमेरिका और इज़राइल द्वारा विकसित एक कंप्यूटर वायरस ने ईरान के नतांज़ परमाणु संवर्धन संयंत्र में सेंट्रीफ्यूज को नष्ट कर दिया। यह औद्योगिक मशीनरी पर पहला ज्ञात साइबर हमला था ।

· वैज्ञानिकों की हत्या: 2010-2012 के दौरान, ईरान के कई परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या हुई, जिसके लिए ईरान ने इज़राइल को जिम्मेदार ठहराया । 2020 में मोहसिन फखरीज़ादेह की हत्या भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी थी ।

· सीरिया में हमले: 2013 के बाद, इज़राइल ने सीरिया में ईरानी ठिकानों और हिज़बुल्लाह को हथियारों की आपूर्ति रोकने के लिए सैकड़ों हवाई हमले किए ।

परमाणु मुद्दा और कूटनीतिक प्रयास

2002 में पता चला कि ईरान नतांज़ में एक गुप्त यूरेनियम संवर्धन सुविधा बना रहा था । इससे अंतरराष्ट्रीय चिंताएं बढ़ गईं। ईरान ने हमेशा दावा किया कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है, लेकिन पश्चिमी देशों को संदेह था कि वह परमाणु हथियार बनाना चाहता है ।


2015 में, ईरान और विश्व शक्तियों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन) के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता (JCPOA) हुआ, जिसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी और बदले में प्रतिबंध हटाए गए ।

लेकिन 2018 में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया । इसके बाद ईरान ने धीरे-धीरे अपनी परमाणु गतिविधियां फिर से शुरू कर दीं और 60% तक यूरेनियम संवर्धन करना शुरू कर दिया, जो हथियार-ग्रेड (90%) से एक कदम दूर है ।

2023: नए युग की शुरुआत

7 अक्टूबर 2023 का हमास हमला

7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इज़राइल पर अचानक हमला किया, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए और 250 बंधक बना लिए गए । यह इज़राइल के इतिहास का सबसे भीषण हमला था। ईरान, जो हमास का समर्थक रहा है, ने फिलिस्तीनियों के समर्थन में बयान दिए ।

इस हमले ने मध्य पूर्व में एक नया संकट पैदा कर दिया। इज़राइल ने गाजा में जवाबी कार्रवाई शुरू की, जो महीनों तक चली और इसमें हजारों फिलिस्तीनी मारे गए ।

2024: सीधे टकराव की ओर

2024 में इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष ने एक नया मोड़ लिया:

· 1 अप्रैल 2024: इज़राइल ने दमिश्क, सीरिया में ईरान के दूतावास परिसर पर हवाई हमला किया, जिसमें दो वरिष्ठ जनरलों सहित 16 लोग मारे गए ।

· 14 अप्रैल 2024: ईरान ने जवाब में इज़राइल पर 300 से अधिक मिसाइल और ड्रोन दागे - यह ईरान द्वारा इज़राइल पर पहला सीधा हमला था ।

· 19 अप्रैल 2024: इज़राइल ने ईरान के इस्फ़हान शहर में एक हवाई रक्षा प्रणाली पर हमला किया ।

· 31 जुलाई 2024: हमास नेता इस्माइल हनियेह की तेहरान में हत्या, जिसके लिए ईरान ने इज़राइल को जिम्मेदार ठहराया ।

· 27 सितंबर 2024: हिज़बुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह की बेरूत में इज़राबल हमले में हत्या ।

· 1 अक्टूबर 2024: ईरान ने इज़राइल पर दूसरा सीधा मिसाइल हमला किया, 180 से अधिक मिसाइल दागी गईं ।

· 26 अक्टूबर 2024: इज़राइल ने पहली बार खुले तौर पर ईरान पर हमला किया, जिसमें मिसाइल कार्यक्रम से जुड़े स्थलों को निशाना बनाया गया ।


2025: "ऑपरेशन राइजिंग लायन"

जून 2025 में संघर्ष और गहरा गया:

· 13 जून 2025: इज़राइल ने "ऑपरेशन राइजिंग लायन" के तहत ईरान के परमाणु और सैन्य प्रतिष्ठानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए । इन हमलों में कई शीर्ष सैन्य अधिकारी और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए, जिनमें रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर हुसैन सलामी भी शामिल थे ।

· 14-15 जून 2025: हमलों को ईरान के ऊर्जा क्षेत्र तक बढ़ाया गया। ईरान ने जवाबी मिसाइल हमले जारी रखे ।

इन हमलों के बाद, ईरान में कम से कम 585 लोगों की मौत की पुष्टि हुई, जिसमें 239 नागरिक शामिल थे, और 1,300 से अधिक घायल हुए ।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने चेतावनी दी कि ईरान के पास 275 किलोग्राम से अधिक 60% समृद्ध यूरेनियम है, जो कई परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त है ।

2026: "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी"

28 फरवरी 2026 को, अमेरिका और इज़राइल ने "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" के तहत ईरान पर संयुक्त हवाई हमले किए ।

राष्ट्रपति ट्रंप ने इन हमलों की घोषणा करते हुए कहा कि ये "ईरानी शासन से आसन्न खतरों को खत्म करने" के लिए किए गए हैं । उन्होंने ईरानी लोगों से अपनी सरकार पर कब्जा करने का आह्वान किया ।

हमलों में तेहरान में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के परिसर को भी निशाना बनाया गया । ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इज़राइल पर ड्रोन और मिसाइल दागे, और बहरीन, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में भी विस्फोट सुने गए ।

इज़राइल और ईरान के बीच दुश्मनी अब एक खुले युद्ध में बदल चुकी है। 1979 के बाद से चल रहा छाया युद्ध अब सीधे सैन्य टकराव में परिवर्तित हो गया है ।

इस संघर्ष के तीन संभावित परिदृश्य हैं :

1. युद्धविराम और बातचीत: अंतरराष्ट्रीय दबाव में दोनों पक्ष समझौते के लिए मजबूर हो सकते हैं।

2. फिर से छाया युद्ध: सीधे टकराव के खतरों को देखते हुए, दोनों पक्ष फिर से प्रॉक्सी और गुप्त अभियानों की ओर लौट सकते हैं।

3. पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध: अगर संघर्ष बढ़ता है और अन्य देश शामिल होते हैं, तो यह एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने और वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने का खतरा है ।

जो भी हो, इज़राइल और ईरान के बीच यह दुश्मनी मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है। 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद से यह संघर्ष लगातार बढ़ रहा है, और इसका अंत अभी दूर दिखाई नहीं देता।

Disclaimer:

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